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अलविदा

 वक्त बदला, हालात बदले, तमाम मौसम और लोगों के मिजाज बदले कुछ नहीं बदला तो ये के साहब ना हम बदले न हमारे हालात बदले बटुआ खाली, जेबें खाली,पे टीएम और फोन पे भी हो गया खाली फिर भी यारों दिल मालामाल है, तमाम रिश्तों, स्नेह, प्यार,और दुआओं से। हैं यकीन कि आने वाला साल गमों को अलविदा कह जाएगा,संग अपने ढेरों खुशियों की सौगात लाएगा। फिर मिलेंगे नए साल में नए ख्यालों के साथ डॉ ममता श्रीवास्तवा ( सरूनाथ)।

मलाल

 सुप्रभात दोस्तों एक लंबे अरसे के बाद आज फिर कलम चल पड़ी है, ममता भरे जज़्बात लेकर सोचा कि आप सभी से साझा किया जाए। क्या आप सभी भी ऐसा ही महसूस कर रहे हैं। जाने वाला साल अपने अंतिम पड़ाव पर है ऐसे समय में सोच रही हूं कि कितना कुछ और करने की चाहत थी इस साल में लेकिन कुछ काम अधूरे रह गए वक्त और हालात की वजह से तो कुछ कल करूंगी इस चक्कर में।  ऐसे समय में सिर्फ इतना ही कहना चाहती हूं----- जो बीत गया उस वक्त का किंचित ना तुम मलाल करो हर दिन नया सवेरा है उठो नया आगाज करो         डॉ ममता श्रीवास्तवा (सरूनाथ)

वक्त

वक्त खिड़कियों से तकते तकते , कब सड़क पर आ गए पता नहीं निहारा करते थे सुनसान सड़कों पर घरों में बैठकर आज बैठे हैं सड़क पर निहारते हैं घरों को यह कैसा वक्त है आया पता नहीं कैसे वक्त ने करवट बदली पता नहीं अब वक्त ही वक्त है उम्र कैसे कटेगी पता नहीं ✍डॉ ममता श्रीवास्तवा,सरूनाथ 

बेटियाँ--

बीते रविवार को पूरा देश बेटी दिवस मना रहा था सभी अपने अपने तरीके से बेटियों को बधाई दी और बेटी होने पर गौर्वान्वित महसूस किया,  लेकिन अभी हफ्ता भी नहीं बीता कि तीन तीन रेपकेस जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हे प्रभु मुझे बिटिया क्यों बनाया? हर मां अपने इष्ट से शायद यही कह रही होगी कि अगले जनम मोहे बिटिया ना दीजो।कैसी मानसिकता है ये , कब खत्म होगी ऐसी मानसिकता, एक तरफ तो लड़कियों की अस्मिता खतरे में है और दूसरी तरफ हमारे कुछ मौकापरस्त राजनीतिज्ञ, व मीडिया वाले इसे मुद्दा बना करके अपने चैनल की, अखबार की टी आर पी बढाने में लगे हैं। जरूरत है ऐसे अपराधियों को तुरंत कड़ी से कड़ी सजा देने की और मुझे लगता है कि मौत से बेहतर इनके लिए कोई सजा नहीं होगी। यह तुष्टीकरण की पोस्टमार्टम में क्या हुआ क्या नहीं हुआ कोई कुछ कहता है कोई कुछ । सब अपनी अपनी तरफ से सफाई दे रहे है। उसका पांव टूटा मिला, उसको इंजेक्शन लगा यह तो साबित हो न हो  उसके साथ रेप हुआ ये तो साबित हुआ न ,क्या इतना काफी नहीं है सजा देने के लिए अपराधियों को। या एक बार फिर इस मुद्दे को यहीं बात करके दबा दिया जाएगा और इंतजार होगा ए...

दोषी कौन

सदियों से महिलाओं को कोसता आया है हमारा समाज, लेकिन आज तक एक बात समझ नहीं आई कि इतनी कामुकता सिर्फ पुरुषों में ही क्यों है ,जो पशुता की ओर धकेल देती है समाज को । एक लड़की, जो न जाने कितने सपने संजोए हुए जीने की कोशिश करती है और अचानक एक दिन बाज की तरह, झपट पड़ता है एक ऐसा पुरुष, जो खुद पर काबू नहीं रख पाता और परिवार का मुखिया कहलाने की चाहत रखता है । हाथरस में हुई जघन्य घटना की जिम्मेदारी कौन लेगा हमारा सोकाॅल्ड समाज जो पुरुष प्रधान है ,धर्म के ठेकेदार ,या नेता जो दलितों के वोट पर अपनी सरकार बनाते हैं या एक बार फिर जिम्मेदार ठहरा दिया जाएगा उस लड़की को कि उसका सबसे बड़ा अपराध ये है कि वो लड़की है और वो भी दलित।

कोरोना संग जिन्दगी

  चल पडी है सडकों पर दौड़ती हुई जिन्दगी मैटो की रफ्तार संग भागती हुई जिन्दगी अलसाई सुबह में भी जागती हुई जिन्दगी नए रंग में रंगी हुई सी लग रही है जिन्दगी  भय है कोरोना का डर भी रही है जिन्दगी  मास्क-सेनेटाइजर ले निकल पडी है जिन्दगी          ✍डाॅ ममता श्रीवास्तवा,सरूनाथ 

Zindagi

Hello dosto ,     aj subh ka akhbar pdhne baithi to mn bda udas ho gya , Jane ku kuch khayl preshan krne lge to Socha ki n ap sbhi SE bhi apni bat share krun . Kitni azeeb bat hai n ki hme pta hai ki ek din duniya se rukhast hona Jo kuch bhi kmaya hai SB yhi chor ke Jana hai fir bhi kuch aur ki chaht ne hme gulam bna rkha hai. Kya kbhi Socha hai apne ye thoda aur ki Kya hd hai? Behter to ye hi hoga ki kuch aisa kren ki log apke pyar ke , apke swabhaw ke kayal ho jayen aur JB is duniya se rukhsati ka wqt aye to sbki juban pe hmara hi nam aye.