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वक्त

वक्त खिड़कियों से तकते तकते , कब सड़क पर आ गए पता नहीं निहारा करते थे सुनसान सड़कों पर घरों में बैठकर आज बैठे हैं सड़क पर निहारते हैं घरों को यह कैसा वक्त है आया पता नहीं कैसे वक्त ने करवट बदली पता नहीं अब वक्त ही वक्त है उम्र कैसे कटेगी पता नहीं ✍डॉ ममता श्रीवास्तवा,सरूनाथ 

बेटियाँ--

बीते रविवार को पूरा देश बेटी दिवस मना रहा था सभी अपने अपने तरीके से बेटियों को बधाई दी और बेटी होने पर गौर्वान्वित महसूस किया,  लेकिन अभी हफ्ता भी नहीं बीता कि तीन तीन रेपकेस जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हे प्रभु मुझे बिटिया क्यों बनाया? हर मां अपने इष्ट से शायद यही कह रही होगी कि अगले जनम मोहे बिटिया ना दीजो।कैसी मानसिकता है ये , कब खत्म होगी ऐसी मानसिकता, एक तरफ तो लड़कियों की अस्मिता खतरे में है और दूसरी तरफ हमारे कुछ मौकापरस्त राजनीतिज्ञ, व मीडिया वाले इसे मुद्दा बना करके अपने चैनल की, अखबार की टी आर पी बढाने में लगे हैं। जरूरत है ऐसे अपराधियों को तुरंत कड़ी से कड़ी सजा देने की और मुझे लगता है कि मौत से बेहतर इनके लिए कोई सजा नहीं होगी। यह तुष्टीकरण की पोस्टमार्टम में क्या हुआ क्या नहीं हुआ कोई कुछ कहता है कोई कुछ । सब अपनी अपनी तरफ से सफाई दे रहे है। उसका पांव टूटा मिला, उसको इंजेक्शन लगा यह तो साबित हो न हो  उसके साथ रेप हुआ ये तो साबित हुआ न ,क्या इतना काफी नहीं है सजा देने के लिए अपराधियों को। या एक बार फिर इस मुद्दे को यहीं बात करके दबा दिया जाएगा और इंतजार होगा ए...